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पद्मावत देख कर लगा कि विरोध था एकदम जायज Featured

Written by  Published in Other State Monday, 29 January 2018 07:29

पद्मावत देख कर लगा कि करणी सेना का विरोध एकदम जायज है।  इस पर टीवी पर लम्बी बहस हो चुकी हैं। विवाद इतना ना बढ़ता तो इस फिल्म का हाल रणवीर कपूर की साँवरिया से बेहतर ना हुआ होता। इतिहास को तो ऐसा तोड़ा मरोड़ा है, और क्षत्रिय शान के लिये दिये गये डायलॉग बाद में जबरदस्ती एड किये लगते हैं। सारा फोकस खिलजी पर रहा उसका युद्ध कौशल, चित्तौड़ के सामने कुश्ती का सीन, उसकी क्रूरता, इस तरह दर्शाई गई कि वो उसका महिमा मंडन साबित हुई।

करैक्टर चुनाव में इतनी बुद्दीहीनता की उम्मीद नहीं की जा सकती। रणवीर सिंह बलिष्ठ शानदार लगते हैं जबकि राजा रत्न सिंह की भूमिका में शाहिद एक लकीर की तरह पतले लगते हैं। ये भी काबिले बर्दाश्त और क्षमा योग्य होता लेकिन इतिहास के साथ घटिया छेड़छाड़ असहनीय है।

भंसाली ना तो पद्मावती के रूप को ढंग से फिल्मा पाए ना ही गोरा बादल जैसे वीरों की रण में शूरता का लेश मात्र वर्णन कर सके। यहां तक कि फिल्म के फैक्ट को ऐसे तोड़ा मरोड़ा कि यंग ऑडियंस कहने लगी कि मूवी में कुछ गलत नहीं दिखाया जो गलत था वो हटा लिया। जबकि साहब को इतना नहीं पता कि जब राजा रत्न सिंह को छुड़ाने गोरा, बादल जाते हैं तब वहां गोरा खिलजी की सेना के छक्के छुड़ा देते हैं और बादल राजा को सुरक्षित चित्तौड़ तक लेकर आते हैं। जबकि फिल्म में रानी खुद जाती हैं और बादल भी रण से लौट नहीं पाते।

मनोरंजन के नाम पर इतिहास से इतना गन्दा दुस्साहस। खिलजी मर गया लेकिन वाक एवं अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर एकता कपूर और भंसाली जैसे लोगो को छोड़ गया। खिलजी ने इतिहास जलाकर अपने हिसाब से लिखवाया। इन जैसे मूर्ख एक डिस्क्लेमर लगाकर “कि यह फिल्म काल्पनिक है” के नाम पर इतिहास को भ्रामक कर रहे हैं।

हाँ फिल्म के अंत में जौहर का सीन कुछ हद तक ठीक फिल्माया है। लेकिन अंत में इतना बता देता तो अच्छा होता कि रानी पद्मावती चित्तौड़ का बदला लेने के लिये 12 साल के छोटॆ से वीर राणा हमीर को गोद लेती हैं और उन्हें सुरक्षित बाहर निकलवा देती हैं। “जो 22 वर्षो बाद 1382 में खिज्राबाद बन चुके चित्तौड़ को फिर से जीतता है। और बाद में राणा कुम्भा,राणा सांगा, महाराणा प्रताप जैसे एक से एक वीर उस राजकुल में हुए, जिन्होंने सैकड़ो वर्षों तक भारत के स्वाभिमान और उसकी रक्षा के लिये अदभुत बलिदान दिये।“ (प्रस्तुत अंश पूर्णाहूति से है, लेखिका मृदुला बिहारी)

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