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चित्रकूट का महत्व आखिर क्यो?.... Featured

Written by  Published in Religion Friday, 20 April 2018 05:37
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तरूण चतुर्वेदी। नि:संदेह चित्रकूट भौतिक दृष्टि से कभी समृद्ध नही रहा हैं, इस की चिंता का विषय भी आर्थिक सम्पन्नता कभी नही था। लेकिन  आध्यात्मिक, और धार्मिक सम्पन्नता के लिए ये भूमि न सिर्फ़ भारत मे बल्कि संपूर्ण विश्व मे विख्यात हैं , क्यों कि इस मिट्टी में त्याग हैं, शांति हैं और आध्यात्म के लिए ये जगह माकूल भी है। तब तो हर रोज यहा यात्री आते है देश और विदेश से  कुछ तो बात है जो खाश है  नेत्र हीनो को आँख और दिवंगो को योग्य बना कर सतगुरु सेवा संघ और दिव्यांग वि.वि. ने साबित कर दिया है की ये सेवा और विद्या की भूमि भी है ।

 यही क्रम ग्रामोदय विश्व वि.वि. का है जो गाँव के उदय के लिए दीप जला रहा है 1992 से , सतगुरु आई हास्पिटल में हर साल 1 लाख लोगों के ऑख का अपरेसन किया जाता है, तब वे बेचारे उजेली दुनिया का उजेला देख पाते है। इन संस्थानो कि स्थापना करने वाले रणछोण दास जी महाराज, नानाजी देश मुख, जगत गुरु राम भद्राचार्य जी है । जिन्होने ये सबित कर दिया की ये पीडित मौनवता की सेवा की भूमि भी है । चित्रकूट के वैभव शाली राज में कुन्दन क्रीड़ा में उछलते साहस , ओज, पराक्रम की उस गाथा का प्रतीक हैं जिस के लिए कोल, भील , किरात , और बानरों के संघ से भागवान राम ने असुरी सत्ता को चुनौवती देदी । कोल , भीलों का स्नेह पाकर भागवान राम आयोध्या का प्यार तक भूल बैठे थे। दस हजार विधार्थीयों का पालन करने वाले कुलपति अत्रि संख्या योग के प्रणेता महर्षी कपिल, माता मंदाकिनी को उतपन्न करने वाली माता अनुसुइया देवा सुर संग्राम के योध्या राजऋषि मुचुकुन्द की गौरव शाली थाथी वाला चित्रकूट आज भी भयाक्रांत मानवता को त्राण दे सकता है। भारत वर्ष के संस्कृतिक गौरव का केन्द् रहा चित्रकूट काल का अतिक्रमण करते हुए प्रत्येक काल में आदर का   पात्र रहा है। विभिन्न काव्य, पुराणों, रामायण में चित्रकूट को चित्रकूट विषय के रुप में सामिल किया है । चित्रकूट आदिमानव का आवास भी रहा है तीस हजार पूर्व रामायण काल के शिला में बनी उकरी हुई रचनाए , तस्वीरे , निर्मित कला कृतिया इसका साबूत देती है। जो करीब 200 गुफाओ में स्थित है, इस लिए इसका नाम चित्रकूट पडा इतिहास के अनुशार धर्म के अनुशार इसकी परिभाषा कुछ अलग तरह से दी गई है ऱाजा कसु इस राज्य का पहला शाशक था जबकि शुंगकाल में यहा का शासन पुष्यमित्र के पुत्र अग्नि मित्र के द़वरा संचालित था।

   फिर मध्य काल में सन 1668 के करीब छत्रसाल ने मुगल सेना अब्दुल हमीद को मंदाकिनी के पश्चिमी तट पर पराजित किया ।

और वही कामदगिरी की परिक्रमा का निर्माण कर वाए थे। जबकि उनके वंशज पन्ना नरेश सभासिंह और अमान सिंह ने चित्रकूट में अनेक मन्दिर बनवाए है कुछ राम घाट में है तो कुछ परिक्रमा मार्ग में है

 ये आज  भी राजसी ठाठ की गवाही दे रहे है

 

 

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